राजनीति में पूँजी का बढ़ता दबदबा: लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती

दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है, आज एक गंभीर संकट से जूझ रहा है। राजनीति में धनबल (मनी पावर) का इतना वर्चस्व हो गया है कि एक साधारण नागरिक के लिए चुनाव लड़ना या अपनी आवाज़ जनता तक पहुँचाना लगभग असंभव-सा हो गया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ताज़ा रिपोर्टों से साफ ज़ाहिर होता है कि कॉरपोरेट घराने और बड़े पूँजीपति राजनीतिक दलों को भारी-भरकम चंदा देकर नीति-निर्माण को अपने हितों के अनुरूप ढाल रहे हैं, जिससे लोकतंत्र की जड़ें कमज़ोर पड़ रही हैं। ADR की नवीनतम रिपोर्ट (वित्त वर्ष 2024-25) के अनुसार, विभिन्न चुनावी ट्रस्टों को कुल 3,826.34 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जिसमें से 3,826.35 करोड़ रुपये राजनीतिक दलों को वितरित किए गए। इसमें से 82.52 प्रतिशत यानी 3,157.65 करोड़ रुपये अकेले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिले। कांग्रेस को मात्र 298.78 करोड़ (7.81 प्रतिशत) और तृणमूल कांग्रेस को 102 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। रियल एस्टेट क्षेत्र से अकेले 629.17 करोड़ रुपये का चंदा आया, जो कुल का 16.44 प्रतिशत है।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने 1,063.12 करोड़ दिए। मात्र 10 बड़े दानकर्ताओं ने कुल चंदे का लगभग आधा (49.89 प्रतिशत) हिस्सा दिया, जिसमें एलिवेटेड एवेन्यू रियल्टी एलएलपी (500 करोड़), टाटा संस (308.13 करोड़) आदि शामिल हैं। यह आँकड़े बताते हैं कि राजनीति अब सेवा का माध्यम कम, धन कमाने और कॉरपोरेट हितों की रक्षा का साधन अधिक बन गई है। चुनाव महँगे होते जा रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में अनुमानित खर्च 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा, जो 2019 से दोगुना है। उम्मीदवारों की संपत्ति में हर कार्यकाल में कई गुना वृद्धि होती है—कई मामलों में 300-400 प्रतिशत तक। कई नेता मामूली पृष्ठभूमि से आकर कुछ वर्षों में करोड़पति या अरबपति बन जाते हैं, जबकि आम आदमी महँगाई, बेरोज़गारी और गरीबी से जूझता रहता है।

मतदाता प्रभावित होना और लोकतंत्र की जड़ों पर असर
बड़े चंदे से दलों को धन मिलता है, जिससे महँगी रैलियाँ, विज्ञापन और कभी-कभी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष वोट खरीद जैसी गतिविधियाँ संभव हो पाती हैं। योजनाओं के नाम पर लालच (मुफ्त बिजली, राशन आदि) मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। टिकट अमीर उम्मीदवारों को मिलते हैं, क्योंकि वे स्वयं फंडिंग कर सकते हैं। इससे plutocracy (धनिक-तंत्र) का खतरा बढ़ रहा है, जहाँ लोकतंत्र जनता का नहीं, बल्कि पूँजीपतियों का हो जाता है।

आम आदमी की पीड़ा
एक साधारण नागरिक देखता है कि नेता जनसेवा के नाम पर अमीर बनते हैं, जबकि वह संघर्ष करता रहता है। चुनाव लड़ने की योग्यता तो होती है, लेकिन प्रचार-प्रसार के लिए करोड़ों रुपये नहीं। पार्टियाँ टिकट धनबल वाले उम्मीदवारों को देती हैं। इससे लोकतंत्र में समान अवसर की भावना खत्म हो रही है।

समाधान के रास्ते
इस संकट से निपटने के लिए तत्काल सुधार ज़रूरी हैं: राजनीतिक दलों पर आरटीआई लागू हो और चंदे की पूरी पारदर्शिता हो—

  • दानकर्ता का नाम, राशि, PAN सार्वजनिक।
  • कॉरपोरेट दान पर सख्त सीमा या प्रतिबंध, गुमनाम दान बंद।
  • राज्य द्वारा सार्वजनिक फंडिंग शुरू हो, ताकि छोटे उम्मीदवार भी प्रचार कर सकें।
  • चुनावी खर्च की वास्तविक सीमा लागू और सभी लेन-देन डिजिटल/बैंक से।
  • चुनाव आयोग को और सशक्त बनाकर धनबल पर सख्त निगरानी।
  • मतदाता जागरूकता: धनबल के बजाय उम्मीदवार की ईमानदारी और नीतियों पर वोट दें।
  • भारतीय लोकतंत्र को तभी मजबूत किया जा सकता है जब राजनीति सेवा का माध्यम बने, न कि धन अर्जन का। समय आ गया है कि आम आदमी की आवाज़ सुनी जाए और पूँजीवाद का यह दबदबा रोका जाए। अन्यथा, लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा। By-हरी शंकर पराशर

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