दिल्ली। राजधानी में लावारिस कुत्तों की बढ़ती संख्या और लगातार सामने आ रही डॉग बाइट की घटनाओं को रोकने के लिए एमसीडी के पास संसाधन सीमित हैं। दरअसल, सरकारी व निजी अस्पतालों में रोजाना एक अनुमान के अनुसार दो हजार लोग एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाने पहुंच रहे हैं। दूसरी ओर एमसीडी सीमित संसाधनों के सहारे लावारिस कुत्तों की समस्या से निपटने की कोशिश कर रहा है। फिलहाल एमसीडी की पूरी व्यवस्था पकड़ो-नसबंदी करो-टीकाकरण करो और वापस छोड़ो मॉडल पर आधारित है। एमसीडी के पास 20 नसबंदी केंद्र हैं, लेकिन इनमें से केवल 13 ही सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इन केंद्रों का संचालन अलग-अलग एनजीओ के जरिये किया जा रहा है। शिकायत मिलने के बाद एमसीडी, एनजीओ की टीम लावारिश कुत्तों को नसबंदी केंद्र तक लाती है। यहां स्वास्थ्य परीक्षण, नसबंदी और एंटी रेबीज टीकाकरण के बाद सामान्य व्यवहार वाले कुत्तों को दोबारा उसी इलाके में छोड़ दिया जाता है।
गत वर्ष सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आक्रामक या खूंखार प्रवृत्ति वाले कुत्तों को निगरानी में रखने की शुरूआत की गई है। राजधानी की विशाल आबादी और तेजी से बढ़ती कुत्तों की संख्या के मुकाबले यह क्षमता काफी सीमित है। कई इलाकों में लोग रात को ही नहीं, बल्कि दिन के समय कुत्तों के झुंड, बच्चों पर हमले और बाजारों में बढ़ती आक्रमकता की शिकायतें लगातार कर रहे हैं। एमसीडी ने खुंखार कुत्तों को रखने के लिए द्वारका में एक डॉग शेल्टर बनाया है लेकिन अभी यह चालू नहीं हुआ है। वह फिलहाल ऐसे कुत्तों को रखने के लिए नसंबंदी केंद्रों का सहारा ले रही है। एमसीडी ने लावारिस कुत्तों के आतंक को कम करने के लिए 735 फीडिंग पॉइंट भी बनाए हैं। एमसीडी का तर्क है कि तय स्थानों पर भोजन मिलने से कुत्तों की गतिविधियां नियंत्रित रहती हैं, लेकिन कई इलाकों में अनियमित फीडिंग को लेकर विवाद भी बढ़ रहे हैं। स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर कहीं भी भोजन डाले जाने से कुत्तों के झुंड बनने लगे हैं।
