भोपाल। समय की धारा में जब सत्य की ज्योति मंद पड़ने लगती है, तब पत्रकारिता का दीपक जलाना पड़ता है। परंतु आजकल यह दीपक प्रायः प्रवचन का मंच बन गया है। एकवचन और बहुवचन की साधारण व्याकरणिक सीमा लांघकर पत्रकार अब ‘मैं’ की जगह ‘हम’ का सहारा लेकर उपदेश देने लगे हैं। दो सौ वर्षों की भारतीय पत्रकारिता की यात्रा इसी द्वंद्व की कहानी है – तथ्यों की रिपोर्टिंग बनाम नैतिकता के उपदेश। 1780 में कोलकाता से जेम्स ऑगस्टस हिकी ने ‘बंगाल गजट’ निकाला। वह एकवचन था – एक साहसी व्यक्ति, जो कंपनी के अत्याचारों को बेनकाब कर रहा था। न तो वह ‘हम’ कहता था, न ही उपदेश देता था। वह सच्चाई लिखता था, चाहे जेल जाना पड़े। उसी परंपरा में राजा राममोहन राय, दादाभाई नौरोजी, बाल गंगाधर तिलक, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और महात्मा गांधी तक पत्रकारिता ‘बहुवचन’ की आवाज बनी, परंतु प्रवचन नहीं। ‘केसरी’, ‘अमृत बाजार पत्रिका’, ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ ने जनता को जागृत किया, परंतु उपदेश नहीं दिया। वे तथ्यों के साथ खड़े थे, न कि मंच पर। स्वतंत्रता के बाद पत्रकारिता ने एक नया रूप लिया।
1950-80 के दशक तक भी कई संपादक एकवचन में लिखते थे। उनकी टिप्पणियां व्यक्तिगत साहस और बौद्धिक ईमानदारी की मिसाल थीं। लेकिन धीरे-धीरे ‘हम’ का बहुवचन बढ़ने लगा। ‘हमारा मानना है’, ‘समाज को चाहिए’, ‘लोगों को जागना होगा’ – ऐसे वाक्य संपादकीय का मुख्य अंग बन गए। एकवचन की निडरता कम हुई, बहुवचन का सामूहिक नैतिक दबाव बढ़ा। और अंततः पत्रकारिता प्रवचन बन गई। आज के डिजिटल युग में यह प्रवचन और भी तेज हो गया है। टीआरपी, क्लिक-बैट और एल्गोरिदम की मजबूरी ने तथ्य को पीछे धकेल दिया। एक घटना होती है, और अगले घंटे में ही दस-दस ‘विश्लेषक’ स्क्रीन पर बैठकर जनता को उपदेश देने लगते हैं – क्या सही है, क्या गलत, कौन देशभक्त, कौन देशद्रोही। जहां हिकी और तिलक तथ्य प्रस्तुत करते थे, वहां आज का पत्रकार पहले अपना नैतिक फैसला सुना देता है, फिर तथ्य चुनिंदा रूप में पेश करता है।
दो सौ वर्षों में पत्रकारिता ने साम्राज्य को झुकाया, स्वराज दिलाया, आपातकाल का सामना किया, लेकिन अब वह खुद ‘सर्वज्ञानी’ बनने का खतरा झेल रही है। एकवचन का साहस – जिसमें पत्रकार कहता है “मेरा मत यह है” – गायब हो रहा है। बहुवचन का ढोंग – “हम सबको लगता है” – बढ़ रहा है। और प्रवचन तो हर तरफ छाया हुआ है। फिर भी आशा बाकी है। कुछ संपादक और पत्रकार अब भी पुरानी अकबरी शान से तथ्यों की रक्षा कर रहे हैं। वे जानते हैं कि पत्रकारिता का धर्म उपदेश देना नहीं, प्रकाश डालना है। प्रकाश फैलाओ, उपदेश मत दो। जनता स्वयं निर्णय लेगी। एकवचन में सच्चाई, बहुवचन में साहस, और प्रवचन से मुक्ति – यही दो सौ वर्षों का संदेश है। पत्रकारिता यदि इस संदेश को अपनाएगी, तो अगले दो सौ वर्ष भी उसकी गरिमा बनी रहेगी। अन्यथा, वह मात्र शोर का साधन बनकर रह जाएगी।
